एक पत्र Dickinson को

6 मई 2015
नई दिल्ली

 
प्रिय Dickinson,

आज ये एहसास हो रहा की ये दुनिया कितनी छोटी है. ऐसा लगता है जैसे आसमान सिमट कर एक छोटे से घर की छत हो गया है जिसके नीचे खड़ी होकर मैं प्रत्येक तारे को निहार सकती हूँ और उससे बातें कर सकती हूँ. हर तारा, आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक, प्रत्येक दूसरे तारे से बात करने का प्रयास कर रहा है. ऐसा ही एक तारा मैं हूँ और इस पत्र के माध्यम से बात करने का प्रयास कर रहीं हूँ , तुम्हारी कविताओं के विषय में.

तुम्हारी कविताएँ सिर्फ तुम्हारी नहीं रह गयी हैं अपितु इस विश्व की हो चली हैं. तुम्हारी कविताएँ पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे तुम ‘तुम’ नहीं ‘मैं’ हो, तुम्हारी कविताओं से मुझे ‘हमारी’ समानता का एहसास होता है. तुमसे कभी बात करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ अन्यथा पूछती तुमसे कि तुम इस बारें में क्या सोचती हो. क्या तुम्हे भी ऐसा लगता है कि हम इंसानो में कुछ न कुछ समानताएं होती हैं? क्यों हम सघन विभेदन के बावज़ूद भी एक-दूसरे को समझ पाते हैं और हमें अपनेपन का एहसास होता है?

मैंने भी तुम्हे तुम्हारी कविताओं के माध्यम से तुम्हे जानने का प्रयास किया है, तुम्हे समझने की कोशिश की है. अपनी समानताओं को महसूस किया है तुम्हारी कविताओं में.एहसास है तुम्हारे उस पल का, जब तुमसे ये कहा गया की तुम्हारी कवितायेँ प्रकाशन लायक नहीं, क्योंकि वें ‘आज’ की शैली में नहीं लिखीं गयी हैं . समझ सकती हूँ, कैसा महसूस किया होगा तुमने जब तुम्हारे अपने ही मार्गदर्शक ने ऐसा कहा. जानती हूँ, इन शब्दों का अर्थ, जो सूई की तरह नसों में छेद कर देते हैं, नश्तर की भांति दिल में सदैव चुभतें रहतें है. ये शब्द और इनके अर्थ, एक कवि और उसकी कविताओं को मृत्यु की ओर धकेल देतें हैं.

पर तुम्हारी कविताओं में मुझे तुम्हारी निडरता दिखाई देती है, जब तुमने इस मृत्यु को स्वीकार न कर उससे खेलना आरम्भ किया और उसे हमजोली बना लिया. कभी उसे कोई रूप बता कर उसकी विवेचना करती तो कभी दृढ़ता से उसके शाश्वत होने का एहसास दिलाती, कभी उसी के कष्टों का मार्मिक चित्रण कर उसे दयनीय बताती तो कभी उसे जीवन प्रदान कर उसकी जीवनी रचती.

ख़ूब सूझी तुम्हे भी! हार न मानकर अपने लिए लिखना शुरू किया, दूसरों की ख़ुशी के लिये नहीं. ये बहुत ही प्रेरणादायक है की तुमने लिखना नहीं छोड़ा. अपने विचारों को शब्दों का बेहतरीन और खूबसूरत जामा पहना कर, किताब के पन्नों में उन्हें सहेंज कर रख दिया और उन्ही शब्दों के लिबास में, उन्ही किताबो के पन्नों में, मृत्यु को भी कैद कर लिया. कितना अपनापन महसूस होता मृत्यु से, तुम्हारी कविताओं के द्वारा. भय नहीं लगता मृत्यु से बल्कि लगाव मालूम होता है . मैं ये नहीं कहती की मुझे मृत्यु से अधिक प्रेम है और जीवन से नहीं, लेकिन मृत्यु के मृत्युहीन होने का मुझे सुकून है और उसके अर्थपूर्ण होने की तस्सली है. तुम्हारी कविताएँ इसी बात की साक्षी है.

राजाओं के राजवाड़े कब के चले गए, दुनिया एक छोर से दूसरे छोर तक सिमट गयी और समय का प्रवाह निरंतर बदलता रहा, परंतु मृत्यु यथावत रही, अज़र, अमर, अपराजित. अपनी कविताओं में तुमने उसे जो प्रेम दिया, आम लोगो के लिए वो बहुत ही मुश्किल है. मालूम होता है कि भगवान के बाद यदि तुम किसी और को मानती हो तो वो शायद मृत्यु ही है. तुम्हारी कविताओं में वह एक आज़ाद मन की तरह मौजूद है, सदाबहार और सर्वशक्तिमान, प्रकृति और व्यक्ति विशेष से अटूट रिश्ता कायम किए हुए, आत्मा और शरीर की फलसफी(philosophy) के दोनों सिरे पड़े हुए.
Death is a dialogue between
The Spirit and the Dust.

मृत्यु से अपनी मित्रता बताने के ख़ातिर तुमने अपनी मृत्यु को भी नहीं बक्शा. जानती हूँ कि असल ज़िन्दगी में मृत्यु से तुम्हारा गहन रिश्ता रहा है, परंतु कभी ये न समझ सकी इस मृत्यु में भी इतनी सजीवता तुम कहाँ से ला सकी. कैसे तुमने अपनी ही मृत्यु को अपने शब्दों में कैद किया और उसको जीने के मायने समझने की कोशिश की. तुम्हारा ये व्यक्तित्व और मृत्यु के प्रति निडरता को संत कावि कबीर की पंक्ति द्वारा बखूबी समझा जा सकता है, “सारी दुनिया उस मौत से डरती है जिसका मैं रोज़ आंनद लेता हूँ”. और अगर तुम्हारे शब्दों में कहूँ ” Dying is a Wild Night and New Road.”

“Death… is the sensation of motion and rest.” तुम्हारी यह परिभाषा, तुम्हारी कविताओं में भिन्न-भिन्न रूप में झलकी है परंतु एक ही मतलब दर्शातीं हैं. तुम्हारी कवितायें मृत्यु को जीवन का प्रतिद्वंदी न बता कर उसे एक विश्वशनीय संगी बतातीं हैं. एक ऐसा साथी जो जीवन की तरह धोखा नहीं देता और जिसका होना उतना ही सच है जितना की जीवन का होना. ज़रूरत है तो सिर्फ उसके वर्चस्व को अपनाने की, उसकी मित्रता को पहचानने की, बजाय उससें डरने के और उसे भयावह बनाने के.

ये अपनापन, ये निडरता और ये मित्रता मैंने तुम्हारी कविताओं में पूर्ण रूप से पायी है Dickinson. मुझे तुम्हारी इन खूबियों से बहुत लगाव है. तुम्हारी कविताएँ मेरे जीवन में एक मार्गदर्शक की तरह हैं और तुम एक प्रेरणास्रोत.

इस उम्मीद में कि दिन-प्रतिदिन, तुम्हारे और तुम्हारी कविताओं के प्रति मेरा लगाव बढ़ता रहे…
तुम्हारी प्रशंशक
रुचिका.