इश्क़नामा

मेरे इश्क़ की गुज़ारिश है कि मेरे लहू को बहने दो
बड़े दिनों की ये बेचैनी है ज़रा इसको भी कुछ कहने दो।

एक शख्शियत को ‘मन की बात ‘ अपनी कहनी है
लब सिल के लोगो के ज़रा इनको कहने दो।

परवाह के नाम पर ये जो चारदीवारी का पहरा है
ज़रा बेपरवाही के शौक़ में ये पहरा भी रहने दो।

बरसों से जिन्हे मौत को तरसाया है
उनके शौकिया जीने को बस शौक ही रहने दो।

घुटने तक बस कीचड है इस राह में
चल सको तो ठीक नहीं तो साथ बस यहीं तक रहने दो।

इन देशप्रेमी नारों में ख़ोज पाओ तो ख़ोज लो खुद को
न भी ख़ोज पाए तो मरने का ख्याल अभी रहने दो।

रुचि तरन्नुम

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ruchikarai

जिस दिन खुद जान जाउंगी लिख दूँगी।

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